Monday 29 July 2013

Shiva is the experiencer and the highest object of experience.

Photo: ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप -११-

साधक-यदि मन ही चाहने लगे तो फिर आपसे प्रार्थना ही क्यों करू ? मन नहीं चाहता इसलिये तो आपकी मदद चाहता हूँ |

भगवान-मेरी आज्ञाओ के पालन करने में तत्पर रहने से ही मेरी पूरी मदद मिलती है | यह विश्वास रखों की इसमें तत्पर होने में कठिन-से-कठिन भी काम सहज में हो सकता है |

साधक-भगवन् ! आप जैसा कहते है वैसा ही करूंगा, किन्तु होगा सब आपकी कृपा से ही | मैं तो निमितमात्र हूँ | इसलिए आपकी यह आज्ञा मानकर अब विशेष रूप से कोशिश करूँगा, मुझे निमित बनाकर जो कुछ करा लेना है, सो करा लीजिये |

भगवान-मदद तो मागता रहें, किन्तु काम करने में जी चुराता रहे और आज्ञापालन करे नहीं| मैंने जो कुछ बतलाया है मुझमे चित लगा कर वैसा ही करते रहों | आगे-पीछे का कुछ भी चिन्तन मत करों | जो कुछ हो प्रसन्नतापूर्वक देखते रहो | इसी का नाम शरणागति है ! विश्वास रखों की इस प्रकार शरण होने से सब कार्यों की सिद्धि हो सकती है |

साधक-विश्वास तो करता हूँ किन्तु आतुरता के कारण भूल हो जाती है और परमशांति तथा परमानन्द ही प्राप्ति की और लक्ष्य चला जाता है |

भगवान-जैसे कार्य के फल की और देखते हो वैसे कार्य की तरफ क्यों नहीं देखते  ? मेरी आज्ञा के अनुसार कार्य करने से ही मेरे में श्रद्धा और प्रेम की वृद्धि होकर मेरी प्राप्ति होती है |

साधक-किन्तु प्रभो ! आपमें श्रद्धा और प्रेम के हुए बिना आज्ञा का पालन भी तो नहीं हो सकता |

भगवान-जितनी श्रद्धा और प्रेम से मेरी आज्ञा का पालन हो सके उतनी श्रद्धा और प्रेम तो तुममे है ही |

Om Namah Shivay.

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Shiva is the experiencer and the highest object of experience. Shiva is the goal of Sadhana. There is nothing apart from Shiva. There is nothing other than Shiva. Whatever dere is, is Shiva. Dere is nothing which is not Shiva. There is no place, which is not Shiva. There is no time, which is not Shiva. To be aware of this is to be aware of Shiva.

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