Wednesday, 10 July 2013

Ramakrishna said : Different kinds of samādhi

Photo: भगवान की दया -१-

कुछ मित्र मुझे ईश्वर के सद्गुणों के संबंधमें लिखने को कहते है, परन्तु मैं इस विषय में अपने को असमर्थ समझता हूँ, क्योकि ईश्वर के सद्गुणों का कोई पार नहीं है | संसार में जितने उत्तम गुण देखने, सुनने और पढने में आते है, वे सभी परिमित है ससीम है और उस अप्रमेय असीम परमात्मा के एक अंशके द्वारा प्रकाशित हो रहे है | 

‘एकाशेन स्थितो जगत्’ (गीता १०|४२) | परमात्मा के गुणों का सम्यक प्रकार
से कोई वर्णन कर भी नहीं सकता | वेद-शास्त्र में जो कुछ कहा गया है, वह सर्वदा स्वल्प ही है, एनी गुणों की तो बात ही अल्प रही | उस दयामय की केवल एक दया के विषय में ख्याल किया जाता है तो मुग्ध हो जाना पडता है | अहा ! उसकी असीम दया की थाह कौन पा सकता है ? जब एक दया का वर्णन ही मनुष्य के लिए अशक्य है तो सम्पुर्ण सद्गुणों का वर्णन करना असम्भव है | लोग उसे दयासिन्धु कहते है, वेद-शस्त्रों ने भी उनको दया का समुद्र बताया है, परन्तु विचार करने पर प्रतीत होता है की यह उपमा समीचीन नहीं है, यह तो उसकी अपरिमित दया के एक अंशमात्र का ही परिचय है | क्योकि समुद्र परिमित है और सब और से सीमाबद्ध है परन्तु अपरिमेय परमात्मा की दया तो अपार है, उसके साथ अनन्त समुद्रों की तुलना नहीं की जा सकती | अवश्य ही जो उन्हें दयासिन्धु और दयासागर बताते है, मैं उनकी निंदा नहीं करता | कारण संसार में जो बड़ी-बड़ी चीज प्रयत्क्ष देखने में आती है, बड़ों के साथ उसी की तुलना देकर समझया जा सकता है |

जहाँ मन और बुद्धि नहीं पहुच सकी, वहाँ एकबारगी उसका वाणी से तो वर्णन हो ही कैसे सकता है ? तथापि जो कुछ वर्णन किया जाता है सो वाणी से ही किया जाता है, चाहे वह कितना ही क्यों न हों, इसलिए भगवान की दया का जो वर्णन वाणी से किया गया है, वह पर्याप्त नहीं है | ईश्वर की दया उससे बहुत ही अपार है | परमात्मा की दया सम्पूर्ण जीवो पर इतनी अपार है की जो मनुष्य इसके तत्व को समझ जाता है वह भी निर्भय हो जाता है, शोक-मोह से तर जाता है, अपार शान्ति को प्राप्त होता है और वह स्वयं दयामय ही बन जाता है | ऐसे पुरुषों की सम्पूर्ण क्रियाओं में दया भरी रहती है | उसमे किसी की भी हिंसा तो हो ही नहीं सकती | 

Om Namah Shivay.

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Ramakrishna said : 

Different kinds of samādhi

"Once a sādhu of Hrishikesh came here. He said to me: 'There are five kinds of samādhi. I find you have experienced them all. In these samādhis one feels the sensation of the Spiritual Current to be like the movement of an ant, a fish, a monkey, a bird, or a serpent.'

"Sometimes the Spiritual Current rises through the spine, crawling like an ant.

"Sometimes in samādhi the soul swims joyful in the ocean of divine ecstasy, like a fish.

"Sometimes, when I lie down on my side, I feel the Spiritual Current pushing me like a monkey and playing with me joyfully. I remain still.

That Current, like a monkey, suddenly with one jump reaches the Sahasrara. That is why you see me jump up with a start.

"Sometimes, again, the Spiritual Current rises like a bird hopping from one branch to another. The place where it rests feels like fire. It may hop from Muladhara to Svadhisthana, from Svadhisthana to the heart, and thus gradually to the head.

"Sometimes, again, the Spiritual Current moves up like a snake. Going in a jigzag way, at last it reaches the head and I go into samādhi.


Om Namah Shivay.

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